Samadhan Jyotish Blog

विभिन्न ग्रहों से द्वितीयेश की युति

विभिन्न ग्रहों से युति, दृष्टि या अन्य विध द्वितीयेश का सम्बन्ध प्रतिफलों को विशेष परिवर्तन कर प्रभावित करता है । अतः यह आवश्यक है कि  कुंडली विश्लेषण करते समय इन पर ध्यान दिया जाये । 

* यदि द्वितीयेश बृहस्पति युक्त स्व राशि अथवा केंद्र गत हो तो जातक धन एवं भौतिक सुख प्राप्त करता है । 

*  यदि द्वितीयेश शुक्र  व् लग्नेश युत हो तो जातक  दृष्टिहीन अथवा अंगहीन होगा । 

* यदि द्वितीयेश द्वादशेश युत त्रिक स्थान अर्थात षष्ट, अष्टम या द्वादश स्थानगत हो तो भी उप्रोक्तसम परिणाम होंगे । 

* यदि चन्द्र पापग्रह युत हो या शुक्र यदि द्वतीय स्थानगत हो तो जातक नेत्रहीन होगा ।

* यदि चन्द्र शुक्र युत  लग्न से षष्ट, अष्टम या द्वादश स्थान में हो तो जातक रतोंधी से पीड़ित होगा । 

* यदि सूर्य शुक्र व् लग्नेश युत लग्न से षष्ट, अष्टम, द्वादश स्थान में  हो तो जातक जन्मांध होगा । 

* इसी प्रकार यदि पिता, माता, भाई व् पत्नी की दृष्टिहीनता का ज्ञान करना हो तो हमें निरिक्षण करना चाहिए कि क्या नवमेश, चतुर्थेश, तृतीयेश, व् सप्तमेश सूर्य व् शुक्र से युक्त लग्न से षष्ट, अष्टम, या द्वादश स्थान में स्थित हैं ? यदि ऐसा है तो उस स्थान विशेष से सम्बंधित परिजन क्रमशः दृष्टिहीन होंगे । 

* यदि द्वतीय स्थान पर शनि लग्नेश या शुभ गृह की दृष्टि हो तो जातक की दीर्घायु निश्चित है । 

* यदि द्वितीयेश नीचगत, सूर्यतप्त, प्रछन्न या गृह युद्ध में पराजित हो तो जातक निजोपर्जित धन अर्थात अपनी कमाई का उपभोग नहीं कर पाएगा । 

अबूझ मुहूर्त ( शुभ मुहूर्त )

अबूझ मुहूर्त ( अनसूझे मुहूर्त) 

हमें जीवन में कई बार शुभ कार्य करने के लिए किसी शुभ मुहर्त की जरूरत होती है । लेकिन कोई शुभ महूर्त नहीं मिलता और हमें वह कार्य करना होता है और हम परेशान होते हैं । अतः यहाँ कुछ ऐसे शुभ मुहूर्तों के विवरण दे रहा हूँ । जिनमें कोई कार्य करने के लिए किसी से मुहूर्त जानने की जरूरत नहीं  होती और कार्य किया जा सकता है बिना किसी अड़चन   के वह निम्न सात मुहूर्त  हैं,

१. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नव संवत्सर, गुडी पड़वा) (मार्च-अप्रैल माह मैं) 

२. वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) (अप्रैल-मई में )

३. आषाढ़ शुक्ला नवमी (भड़रिया नवमी (जुलाई में ) 

४. आश्विन (क्वार) शुक्ल दशमी (विजया दशमी, दशहरा ) (अक्टूबर में )

५. कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (गोवर्धन, अन्नकूट) (नवम्बर में )

६. माघ शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी ) ( फरवरी में )

७. फाल्गुन शुक्ल द्वतीया (फुलारिया दौज ) (मार्च में )

 

लग्न स्थान गत लग्नेश (पार्ट २)

लग्न स्थान गत लग्नेश (पार्ट – २ )

अब आगे

लग्न तथा लग्नेश की दुःस्थिति

       लग्न व लग्नेश दुःस्थित नहीं होने चाहिए | लग्न दूषित नहीं होना चाहिए | यह कहा जा सकता है कि लग्न स्थान निज् बल हीन हो जाता है जब लग्न में

·         नीचगत गृह स्थित हो; या

·         शत्रुभावी गृह स्थित हो, अथवा पापग्रह स्थित हो, अथवा गृहयुद्ध में पराजित या अस्त गृह स्थित हो; अथवा

·         ऐसा गृह स्थित हो, जो नवांश में षष्ट, अष्टम या द्वादश स्थान में हो; अथवा

·         किसी वर्ग कुंडली में षष्ट, अष्टम या द्वादश स्थान में स्थित गृह लग्न में हो, अथवा

·         प्रछन्न स्थिति गत गृह लग्न में स्थित हो, तो उसे बलहीन माना जाता है, क्योंकि यह गृह के नैसर्गिक गुणों से स्पष्ट हो जाता है |

नीचगत गृह बलहीन होता है; अतः लग्न में इसकी स्थिति एक दोष है तथा लग्न को अशक्त करती है |

शत्रुभावी या विरोधी स्वाभावी गृह इसके विपरीत केवल लग्न के बल का ही नाश नहीं करता, अपितु ऐसे शुभ गुणों को भी नष्ट करता है, जो लग्न जातक को प्रदान कर देता | अतः यह लग्न के बल का ह्रास करता है |

पाप गृह, राहू, केतु व शनि लग्न में होने पर जातक पर दुष्प्रभाव डालते हैं, अतः लग्न में  इनकी स्थिति अवांछनीय है |

·         पुरुष कुंडली के लग्न स्थान में  राहू की स्थिति मुख्यतः अशुभ होती है |

·         स्त्री कि कुंडली के लग्न स्थान में केतु की स्थिति शुभ नहीं होती | दोनों ही परिस्थितियों में प्रत्यय स्थिति शुभ होती है |

गृह युद्ध में पराजित गृह, कुछ भी प्रदान करने में  असमर्थ होता है | यह अपने गुणों से रहित होता है | अतः इसकी लग्न में स्थिति लग्न के लिए हितकर नहीं होती |

अस्त गृह के  संबंध में भी यही सत्य है क्योंकि यह अस्त है, यह निर्बल होता है तथा इसीलिए लग्नाभिव्रद्धि हेतु शक्तिविहीन होता है |

नवांश में लग्न स्थान षष्ट,  अष्टम अथवा  द्वादश स्थान में स्थित नहीं होना चाहिए | यह नैसर्गिक निजबल हीन हो जाता है तथा क्षीण माना जाता है, जिससे जहाँ तक  आयुष्य, मनःस्थिति, चमत्कारिक व्यक्तित्व तथा सम्पूर्ण शारीरिक कद काठी का संबंध है,  व्यक्ति का स्वभाव व अवस्था संदेहास्पद रहेंगे | वे जीवन में  सदैव असफलताओं व अमन्य्ताओं से पीडित रहने की संभावना है | जातक का जीवनकाल अल्प होगा | यह इस स्थान विशेष के शुभ फलों या सौभाग्य तथा भाव विशेष के कार्कत्वों के विलोपन का सूचक है |

·         कुछ दैवज्ञों की धारणा है कि लग्नेश इन  भावों (षष्ट, अष्टम व द्वादश) में बल विहीन हो जाता है तथा सम्बंधित स्थान के दुष्फल प्रदान करता है |

इसी प्रकार लग्न वर्गों में षष्ठ, अष्टम या द्वादश स्थान में नहीं होना चाहिए | यदि यह किसी वर्ग में षष्ठ, अष्टम या द्वादश में है तो उस वर्ग विशेष का नैसर्गिक बल नष्ट हो जाता है |

प्रच्छन्न गृह, लग्न स्थान को कोई शुभ फल प्रदान करने में असमर्थ होता  है | ग्रहण किसी गृह को तब प्रच्छन्न कर देता है जब वह उस नक्षत्र पर गोचर करता है जो ग्रहण से पीडित हो | ऐसा गृह प्रच्छन्न गृह कहलाता है |

विभिन्न राशियों में लग्नगत सूर्य---

       सभी ग्रहों में सूर्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है | सूर्य की विभिन्न राशियों के लग्न में स्थित होने से विभिन्न फल प्रदान करती है --- १. मेष लग्न में जातक धनी होता है, २. वृषभ लग्न में जातक द्रष्टिहीन या द्रष्टि दौर्बल्य होगा , ३.मिथुन लग्न में जातक की द्रष्टि उत्तम होती है, परन्तु मूर्ख होता है, ४. कर्क लग्न में जातक को एक चौथाई द्रष्टि प्राप्त होती है , ५. सिंह लग्न में जातक का शरीर पुष्ट होता है, यद्यपि रतौंधी से पीडित होगा, ६. तुला लग्न में जातक माता पिता से परित्यक्त होता है,ह्रदय रोगी होता है तथा एक पुत्र गोद लेने की सम्भावना है , ७. मकर लग्न जातक लालची तथा धनी होता है

·         यदि कोई जातक लग्न में सूर्य व राहू तथा अष्टम गत चन्द्र के संग जन्म लेता है तो जातक की जन्म के समय ही किसी उपकरण के कारण मृत्यु हो जाती है |

·         यदि लग्नं में शनि व राहू स्थित हों, तो जातक व्रह्तबीजम (अंडवृद्धि) से पीडित होता है |

विभिन्न ग्रहों कि लग्न पर द्रष्टि का फल :----

       १. सूर्य – सुखद जीवन पिता का प्रिय, पित्र कर्मों में प्रवृत्त, पराक्रमी, साहसी; २. चन्द्र – प्रसिद्ध ; ३. मंगल – नृप, पराक्रमी, युद्ध प्रिय, यदि यह द्रष्टि षष्ठ स्थान से हो तो अत्योत्तम होगी ; ४. मूर्तिकार, वक्ता ; ५. ब्रहस्पति – धर्मपरायण, शासक व अमात्यो का प्रिय, विख्यात व सुखी ; ६. शुक्र – धनी, वैश्या रमण का शौक़ीन ; ७. शनि – सदैव मृत्युभय ग्रस्त, मूढ़, दरिद्र ; ८. यदि तीन शुभ गृह लग्न को द्रष्ट करें – अतिविशिष्ट व्यक्ति,शासक व अमात्यों का प्रिय ; ९. यदि कोई द्रष्टि लग्न पर न हो – लालसा मुक्त (विरक्त)

विभिन्न स्थान गत लग्नेश ---

       लग्नेश के फल कुंडली में इसकी स्थिति व इसके अधिग्रहित स्थान के अनुरूप बदलते रहते हैं | अतः लग्नेश का कुंडली में इसकी स्थिति से विश्लेषण सदैव श्रेयस्कर रहता है |

लग्न स्थान में लग्नेश –

       लग्नेश का लग्न स्थान में ही होना शुभ स्थिति है | लग्न स्थान गत लग्नेश जातक को अलोकिक प्रतिभावान बनाता है | व्यक्ति आत्मश्लाघी होगा तथा किसी भी परिस्थिति में किसी से प्रभावित नहीं होना चाहेगा

ध्रष्टता की सीमा तक प्रचुर आत्म विश्वास से संपन्न जातक ऐसा व्यक्ति होगा जो शासित होने के स्थान पर शासन करना चाहेगा | इसके अतिरिक्त जातक प्रबल अजेय इच्छाशक्ति वान, महँ व्यक्तित्ववान, दृढ प्रतिज्ञ तथा दृढ मनः संकल्पी होगा | ऐसे व्यक्ति निजोद्योग से जीवन में उन्नति करते हैं | लग्नेश के  लग्न में ल होने से उक्त गृह के नैसर्गिक गुण ऐसे जातक में अधिक परिलक्षित होंगे |

       यदि लग्नेश पाप गृह है तो  जातक को निष्ठुर भाव प्रदान करेगा तथा शुभ गृह होने पर कोमल सुसभ्य स्वाभाव प्रदान करेगा | असंस्कृत परिवार में जन्मे होने पर भी जातक सुसभ्य होगा |

       यदि क्रूर लग्नेश को पाप गृह द्रष्ट करे,  तो यह जातक के क्रूर स्वाभाव में  वृद्धि करेगा, परन्तु यह जातक के लिए व्यक्तिगत रूप में अशुभ नहीं होगा | दूसरी ओर शुभ द्रष्टि निर्दयता का शमन करेगी |

       साथ ही शुभ द्रष्टि जातक को अत्यंत दीर्घायु प्रदान करती है | दूसरी ओर क्रूर ग्रहों की द्रष्टि यद्यपि दीर्घायु प्रदान करेगी, तथापि वे दुर्घटनाप्रणत जीवन देंगे | दुर्घटना अथवा अन्य कष्ट जीवन में आयेंगे, जिसके कारण व्यक्ति को किसी प्रकार की मानसिक विषणणता या शारीरिक विकृति प्राप्त हो सकती है |

       यदि लग्न गत लग्नेश षष्ठेश से युत या द्रष्ट हो, तो जातक रुग्ण होगा |

       लग्नेश के लग्न में स्थित होने से व्यक्ति भाग्यवान होता है तथा दीर्घायु निश्चित है | व्यक्ति का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावी होता है | वह परामर्श हेतु अन्यों के विचारों की उपेक्षा करेगा, दूसरों की भर्त्सना भी कर सकता है तथा अहंमनोर्ग्रंथी ग्रस्त हो सकता है |

       जातक का जीवन घटनापूर्ण होगा व जीवनवृत्त दीर्घावधिक होगा, अर्थात उसका कार्मिक जीवन लम्बा होगा | कार्मिक जीवन में उन्नति पाने हेतु व्यक्ति को जीवन में अत्यंत परिश्रम करना पड़ेगा | व्यक्ति जीवनपर्यंत कर्मशील रहेगा | लग्नगत लग्नेश व्यक्ति को असाधारण प्रतिभावान, परन्तु अदम्य अहंवादी बनाता है | व्यक्ति में अपरिमित आत्मविश्वास होगा तथा वस्तुतः शासित होने के स्थान पर शासन करना चाहेगा |

       लग्न स्थान गत लग्नेश, जातक के असाधारण बल का सूचक है | व्यक्ति निजव्यक्तित्व व निज विचारों से पूर्ण सामंजस्य रखेगा, अन्यों को सदैव सफलता व ऊर्जा की किरणें उत्सर्जित करेगा तथा उसका आयुष्य सुनिश्चित होता है | व्यक्ति सतचित्त तथा सद्चारित्रवान होगा |

अन्य ग्रहों से लग्नेश की लग्न में युति –

       १. लग्न गत लग्नेश से सूर्य की युति या द्रष्टि जातक को सशक्त प्रभुत्ववादी शक्तियां प्रदान करेंगी | वह नेता बनेगा परन्तु अल्प मित्रवान होगा |

       २. शुभ चन्द्र की युति अथवा द्रष्टि जातक को मोहक व्यक्तित्व व प्रबल स्मरण शक्ति प्रदान करेगी तथा बाह्य समाज में आत्म प्रदर्शन से जीवन में उन्नति करेगा | उदाहरनार्थ मोनिका ल्युइन्स्कि ने स्वयं को कुप्रसंग में प्रदर्शित किया और अपने इस प्रकार प्रदर्शन से हजारों डॉलर उपार्जित किये |

       ३. मंगल की युति अथवा द्रष्टि जातक को उत्तम साहस व आत्म सम्मान देगा | व्यक्ति निज प्रयोंगो से उपार्जन करेगा तथा गृह एवं वाहनयुत सुखद जीवन पायेगा |

       ४. यदि सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, ब्रहस्पति लग्न में स्थित हों या लग्नेश को द्रष्ट करें, तो जातक का रूप सुंदर होगा |

       ५. शुक्र के लिए भी यही फल होगा, परन्तु इससे जातक में स्त्री गुण प्रधान होगा |

       ६. शनि से युत अथवा द्रष्ट होने पर जातक को आयुष्य प्रदान करता है | लग्नेश के शुभ शनि से युत अथवा द्रष्ट होने पर जातक को उत्तम आयुष्य प्राप्त हो सकता है |

       इसके अतिरिक्त भी, किसी कुंडली में स्वग्रही शनि जातक के आयुष्य के परिप्रेक्ष्ण में शुभ माना जाता जायेगा |

       शनि या राहू की लग्न में स्थिति अथवा द्रष्टि जातक को गहरा रंग रूप प्रदान करती है |

       लानेश की त्रिकोनाधिपतियों से युति जातक को भाग्यशाली बनाती है | व्यक्ति दीर्घायु प्राप्त करेगा | व्यक्ति सदैव देवालयों से संबंध रखेगा | ऐसे जातक पुण्यात्मा होते हैं, परन्तु उनका दांपत्य जीवन सदैव तनावग्रस्त रहेगा | वे सनातन कुंवारे हो सकते हैं अथवा यदि वे विवाह भी कर लें तो उनका दाम्पत्य जीवन सौहाद्रपूर्ण नहीं होगा या यौनसुख प्राप्त नहीं होगा |

       लग्नेश लग्न या सप्तम स्थान में अथवा सप्तमेश लग्न में मिथ्याभिमान या आत्मनुराग प्रदान करते हैं अर्थात उनकी अपने से प्रीती अधिक होती है तथा संभव है कि वे अविवाहित ही रहें अथवा विवाह के पश्चात् भी अकेले रहने अथवा एकान्तता को अधिक मान दें |

लग्न में गृह ---

       यदि सूर्य लग्न में स्थित हो तो जातक स्वर्णिम आभायुक्त होगा, पुष्ट शरीर व विरले केशों वाला होगा |  व्यक्ति राजसी अभिवृत्ति वाला होगा |

       चन्द्र लग्न में जातक को कोमलता, स्वप्निल छवि व स्थिरबुद्धि प्रदान करेगा |

       यदि मंगल लग्न में स्थित हो तो जातक का शरीर पुष्ट व पौरुषयुक्त तथा स्वाभाव उग्र होगा | व्यक्ति में बुद्धि से शारीरिक बल अधिक होगा | मंगल जातक को उत्तम साहस, स्वाभिमान निज प्रयत्नों से उपार्जन तथा गृह तथा वाहन सुख प्रदान करेगा |

       बुध जातक को चपल शरीर प्रदान करेगा | विचारवान वक्ता होने के साथ साथ व्यक्ति बुद्धिमान व विनोदी होगा | व्यक्ति का द्रष्टिकोण मर्यादित होगा |

       लग्न गत ब्रहस्पति जातक को गरिमापूर्ण व्यक्तित्व तथा अत्यंत गंभीर स्वाभाव भी प्रदान करता है | बाल्यकाल में भी जातक के हाव भाव में  गाम्भीर्य होगा | ब्रहस्पति से युत होने पर लग्नेश व्यक्ति को सात्विक बनाएगा | ऐसे व्यक्ति ईश्वर व भक्ति की ओर अधिक अनुरक्त होंगे |

       लग्नगत शुक्र व्यक्ति को उन्नत व उन्नत नेत्रों सहित अलोकिक कान्तियुक्त मुख प्रदान करेगा | जातक विपरीत लिंगी जातकों तथा धनी व्यक्तियों से सहयोग प्राप्त करेगा |

 

       लग्न स्थान में शनि किसी कुंडली में, जातक के आयुष्य निर्धारण के परिप्रेक्ष्य में शुभ माना जाता है 

लग्न स्थान गत लग्नेश

ज्योतिषीय ज्ञान

लग्न स्थान गत लग्नेश (पार्ट – १ )

लग्न बल – लग्न कुंडलीकासर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान हैं, अतः यह आवश्यक है कि इच्छित फल प्रदान करने के लिए यह बली होना चाहिए | लग्न के बली होने के लिए यह निम्न प्रकार द्रष्ट होना चाहिए |

Ø  प्रथमतः शुभ  ग्रहों, अपने स्वामी, ब्रहस्पति या बुध से, अथवा

Ø  द्वितीयतः पूर्ण योगकारक गृह से, अथवा

Ø  अंततः उच्चस्थ गृह से |

लग्नेश का महत्व – लग्नेश कि  भूमिका किसी भी प्रकार कम नहीं आंकी जा सकती | वास्तव में, यह जातक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब है | लग्नेश व्यक्ति के निजी स्वस्थान, उसे प्राप्तव्य उप्लाभ्धियाँ या जो भी संकेत गोचर हो, दर्शायेगा | यह आवश्यक है कि लग्नेश सुस्थित तथा बली हो | केवल तभी यह जातक को कुंडली में द्रष्ट संकेतों को प्रदान करने में समर्थ होगा | यह समस्त भ्वाधिपतियों पर लागू होता है, परन्तु लग्नेश के लिए यह इस सहज तथ्य के कारण विशेषतः अत्यावश्यक है कि लग्न का स्वामी सम्पूर्ण कुंडली का स्वामी है |

       मान लीजिये वृश्चिक लग्न का नवमेश चन्द्रमा, सप्तम स्थान (वृषभ) में उच्चस्थ है, परन्तु उस स्थान का स्वामी, अर्थात शुक्र, नीचगत है | इस स्थिति में यद्यपि वह स्थान, अर्थात सप्तम स्थान, उच्चस्थ चन्द्र की स्थिति के कारण बल प्राप्त करता है, तथापि इस स्थान का नैसर्गिक बल नष्ट हो जातक है, क्योंकि इसका स्वामी शुक्र नीचगत है | 

       भावेश के नीचगत होने से स्थान बलहीन हो जाता है तथा इसका आधार निशक्त हो जाता है | अतः किसी स्थान के बली होने के लिए उसका स्वामी सुस्थित होना चाहिए |

गृह स्थिति - लग्नेश के समान ही कुंडली में स्थित गृह भी महत्वपूर्ण होते हैं | अतः उनके महत्व के महत्व को ध्यान में रखना दैवज्ञ के लिए आवश्यक है | अतः यह आवश्यक है कि उन्हें कम महत्वपूर्ण न समझना चाहिए |  वे सुस्थित होने चाहिए |

       कोई भी गृह सुस्थित होता है जब वह : _

·         उच्च, मूलत्रिकोण या स्वराशी में हो,

·         केंद्र या कोण में  स्थित हो,

·         शुभ ग्रहों से सम्बद्ध (किसी राशि विशेष में युत) हो,

·         शुभ कर्तरी योग में हो,

·         शुभ ग्रहों (लग्नेश या पूर्णयोगकारक नैसर्गिक क्रूर गृह होने पर भी) से द्रष्ट हो ;

·         वर्गों में सुस्थित हो |

लग्न स्थान व लग्नेश का वर्गों में स्थितिवश बलाबल – लग्न व लग्नेश का विभिन्न वर्गों अथवा वर्ग कुंडलियों में  बलाबल अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि केवल वर्ग विशेष में इनके बली होने पर ही वे राश्यचक्र में द्रष्ट फलों को प्रदान करने में समर्थ होंगे |

लग्न स्थान का वर्गों में बलाबल – लग्न स्थान  कि वर्गों में स्थिति, अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह इसका बलाबल दर्शाती है |

       लग्न स्थान का नवांश अथवा किसी वर्ग विशेष में केंद्र या त्रिकोण में स्थित होना शुभ है |

       लग्न स्थान के एकादश स्थान गत होने पर, यह जातक को आयुष्य तथा वर्ग विशेष के कार्कत्वों की जीवन्तता भी प्रदान करता है |

उदाहरनार्थ –

·         यदि लग्न स्थान द्वादशांश चक्र के एकादश स्थान में स्थित हो, तो माता पिता से सम्बंधित वृद्धि दर्शाता है, अर्थात माता पिता से अत्यधिक लाभ प्राप्त करेगा तथा उनके प्रति निष्ठावान होगा |

·         लग्न स्थान किसी भी वर्ग कुंडली के षष्ट, अष्टम, अथवा द्वादश स्थान में स्थित नहीं होना चाहिए | यदि यह स्थित होता है, तो उस वर्ग विशेष में इसका नैसर्गिक बल नष्ट हो जाता है तथा जातक उस वर्ग विशेष के फलों का उपभोग करने में समर्थ नहीं हो सकेगा |

·         यदि लग्न स्थान, दशांशचक्र के षष्ट स्थान में स्थित होता है, तो व्यावसायिक क्षेत्र में जातक  के अनेक शत्रु होंगे | व्यक्ति एक प्रकार से मानसिक उद्वेग के कारण रोग ग्रस्त रहेगा, जो उसे कार्यालय पहुँचते ही व्यथित कर देगा, यद्यपि वह घर पर पुर्णतः स्वस्थ होगा |

·         यदि सप्तमांश में, लग्न स्थान अष्टम स्थान में स्थित हो, तो जातक के संतान से सौहार्द्रपूर्ण संबंध नहीं होंगे अथवा संतान का आयुष्य बाधित होगा | यदि दुष्प्रभाव अधिक होंगे तो यह संतान को जातक के जीवनकाल में ही अकाल मृत्यु दे सकता है |

लग्नेश का विभिन्न वर्गों में बलाबल

·         लग्नेश पर भी यही सिद्धांत लागू होता है | लग्नेश किसी वर्ग में  षष्ट, अष्टम, अथवा द्वादश स्थान में स्थित नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे वह उस वर्ग विशेष में अपना नैसर्गिक बल खो देता है तथा जातक के उस वर्ग विशेष के कार्कत्वों के फलित परीणामों को भोगने की संभावना नहीं होति |

·         द्रेषकांण के षष्ट स्थान में लग्नेश को स्थित होना जातक के पूर्वजन्म दोष का सूचक है तथा वह असाध्य रोग संग जन्मा हो सकता है, जो लग्नेश की दशा अथवा अन्तर्दशा में फलित होंगे | सहसा ही रोगोदभेद हो सकता है | यदि द्रेषकाण के षष्ट स्थान गत लानेश राहू से भी युत हो तो जातक चोर अथवा चौर्व्रतिक हो सकता है | इस प्रकार के दोष के निवारण हेतु द्वातियेश अथवा दशमेश के अधिदेवता कि उपासना करनी चाहिए, क्योंकि द्वतीय व दशम स्थान षष्ट स्थान से त्रिकोण स्थान हैं | चतुर्विशांश के षष्ट स्थान  या षष्टेश को भी जातक द्वारा शुद्ध ह्रदय से निवारण उपासना हेतु देखा जा सकता है |

·         त्रिशांश के अष्टम स्थान गत लग्नेश दर्शाता है कि जातक के नैतिक चरित्रवान होने की संभावना नहीं है |

लग्नेश का सामान्य बलाबल

       अन्य द्रष्टिकोण से भी, लग्नेश के बलाबल का अध्ययन किया जाना चाहिए | अन्य भावों में  इसकी स्थिति से यह प्रभावित होता है | यह निम्न स्थितयों में बल प्राप्त करता है :

·         अपने स्थान से केंद्र में होने पर,

·         अपने स्थान से कोण में होने पर,  तथा

·         (जैमिनी) आत्मकारक से कोण में होने  पर |

उपरोक्त वर्णित किसी भी स्थिति में लग्नेश बली माना जाता है |

लग्न स्थान निम्न प्रकार बली हो जाता है :

·         लग्नेश से केंद्र में होने पर, तथा

·         (जैमिनी) आत्मकारक से कोण  में  होने पर |

केन्द्रों अथवा त्रिकोणों में  लग्नेश अत्यंत शुभ माना जाता है | केंद्र  स्थान प्रथम, चतुर्थ,सप्तम, व दशम स्थान हैं | कुछ विद्वान् चन्द्र राशि से भी इसकी स्थिति देखते हैं | यदि लग्नेश चन्द्र से केंद्र में हो तो जातक को दृढ मनःस्थिति प्रदान करता है | ऐसा जातक जो दूसरों से मानसिक संवाद अथवा मेल मिलाप बना सकता है |

सप्तम स्थान के अतिरिक्त केंद्र सदैव बली माने जाते हैं | इसका कारण स्वयं व्याख्यात्मक है कि सप्तम स्थान होने से यह मारक स्थान है तथा इसीलिए यह लग्नेश की शुभ स्थिति नहीं है |

                                                              क्रमशः-----------

 

 

चतुर्थ स्थान गत लग्नेश

ज्योतिषीय ज्ञान

चतुर्थ स्थान गत लग्नेश

       लग्नेश की चतुर्थ स्थान में स्थिति अत्यंत शुभ होती है क्योंकि यहाँ यह एक केंद्र का स्वामी होकर अन्य केंद्र में स्थित होता है |

       चतुर्थ स्थान गत लग्नेश, व्यक्ति को अत्युत्तम वैभव प्रदान करता है | यह मात्र बल दर्शाता है, अतः व्यक्ति के अपनी माता से सौहार्दिक संबंध होंगे, यदि चतुर्थ स्थान में  लग्नेश नीचगत अथवा पाप्युत न हो |

       चतुर्थ स्थान गत लग्नेश का जातक भौतिक आनंद व सांसारिक सुखों का  उपभोग करेगा | इसका कारण है कि चतुर्थ स्थान सुख-स्थान है एवं लग्नेश (जो जातक का सूचक है) सुख-स्थान में होने से जातक को इस जन्म में अधिकतम सुखों के उपभोग में सक्षम बनता है |

       जातक निजोद्योग से सुख प्राप्त करेगा एवं निजाश्रय से व परावलंबन-विहीन जीवन में प्रगति करेगा; ऐसा चतुर्थ चतुर्थ स्थान से, लग्न स्थान दशम स्थान होने के कारण है | अतः लग्नेश चतुर्थ स्थान से दशमेश भी है | इस स्थिति के कारण जातक अपना सुख स्वयं अर्जित करेगा यद्यपि जीवन के किसी पल में अनुताप व विषद ग्रस्त होगा | व्यक्ति का जीवन के प्रति द्रष्टिकोण सफलता व संतोष प्राप्त करने तथा ऐश्वर्यपूर्ण जीवन यापन वाला होगा |

       यह ऐसे जातक का भी सूचक है जो प्रायः भाग्यवान तथा जीवंन के समस्त भोगों व विलासों का उपभोग करने हेतु जन्मा है | व्यक्ति अपने परिवार में सर्वाधिक भाग्यवान व्यक्तियों में से एक माना जायेगा | इस जातक के जन्मोपरांत परिवार असाधारण उन्नति प्राप्त करेगा क्योंकि व्यक्ति परिवार में ऐश्वर्य लायेगा | व्यक्ति भ्रत्यों कि सेवा व वाहन का उपयोग करेगा तथा साथ ही प्रचुर अचल सम्पत्तिवान होगा |

       व्यक्ति जन्म से ही धनि, नृप सद्रश गुणों से परिपूर्ण होगा | जातक अमात्य गुणयुक्त प्रतिष्ठित व्यक्ति होगा |

       चतुर्थ स्थान संसद (राज्यसभा) का भी कारक है, अतः चतुर्थगत लग्नेश का जातक स्वभावतः सांसदीय (राजसी) गुणों से परिपूर्ण- जन्मजात नेता होगा | अतः जातक के प्रभुत्वाधीन अनेकों कर्मचारी होंगे अथवा वह शासक या कोई शासकीय अधिकारी हो सकता है | व्यक्ति निश्चित तौर पर शासन से सम्बद्ध होगा |

       यदि लग्नेश, चतुर्थ स्थान में सुस्थित हो, तो जातक जन्म से ही तीक्ष्ण व चतुर बुद्धि होगा | यह स्थिति स्वयं में अत्यंत शुभ है क्योंकि चतुर्थ स्थान शिक्षा का सूचक है |  लग्नेश का चतुर्थ स्थान में होना यह दर्शाता है कि जातक निजोपर्जित धन द्वारा स्वयं को शिक्षित करेगा क्योंकि लग्नेश चतुर्थ स्थान से दशमेश भी है |

       लंगेश चतुर्थ स्थान में, उच्चतम ग्रहयुत हो, तो जातक के माता पिता से मधुर संबंध होंगे |

       यदि बुद्धि का कारक बुध इस योग में  सम्मिलित हो तो  जातक कि शिक्षा अक्षुण्ण होगी | अन्य शब्दों में, जातक अपनी शिक्षा के आधार पर कोई ऐसा पुरस्कार प्राप्त करेगा जिसे उसके मरणोपरांत भी स्मरित किया जायेगा, जिससे व्यक्ति को अमरत्व प्राप्त होगा, परन्तु मिथुन लग्न के लिए यह यथार्थ नहीं होगा क्योंकि इस परिस्थिति में बुध चतुर्थेश होने से उस पर कारको भाव नाशय सिद्धांत लागू होगा | अतः यद्यपि जातक प्रखर बुद्धिमान होगा, तथापि वह अपनी शिक्षा के आधार पर ख्याति व यश प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा | उसके द्वारा निष्पादित कार्यों का मान कोई अन्य व्यक्ति प्राप्त करेगा |

       चतुर्थ स्थान गत लग्नेश, चतुर्थ स्थान से दशमेश की चतुर्थ स्थान में स्थिति के कारण माता से भौतिक सुखों की प्राप्ति सुनिशिचित करता है | इसका तात्पर्य यह भी है कि जातक माता के कर्मों व उपार्जन से सुख तथा कीर्ति भी प्राप्त करेगा |

परिस्थिति परिवर्तित होती हैं :-

·         यदि लग्नेश नीचगत या दुःस्थित हो; तब जातक को माता से प्रत्यक्ष सुख प्राप्त नहीं होंगे | इस योग में मंगल का संबंध पर जातक माता से सदैव विद्वेष रखेगा | ऐसा नहीं है कि जातक माता से शत्रुता रखेगा, परन्तु दोनों के मध्य सदैव विवाद बना रहेगा |

·         चन्द्र मंगल से युत होने पर भी जातक का माता से मतैक्य नहीं  होगा | जातक सदैव यही अनुभव करेगा कि माता अन्य संतानों को जातक से अधिक स्नेह करती है | यह भावना इतनी प्रबल होगी कि व्यक्ति इसे मान भी लेगा और संभव हो सकता है कि माता को कह देगा कि वह उसे स्नेह नहीं करती | जातक पर माता जितना अधिक ध्यान देगी, उतना ही यह विचार, कि माता की नम्रता सद्भावना जनित न हो कर छदम है, द्रढता पूर्वक गहन होता जायेगा | जातक को सदैव यह हीनभावना रहेगी | इससे व्यक्ति प्रत्येक वयव्रद्ध नारी में मात्र-दर्शन करेगा, जिसके फल स्वरूप उसका अपनी जननी से भावनात्मक अपसरण हो जायेगा |

·         चन्द्र के चतुर्थ स्थान में लग्नेश से युति या संबंध होने से जातक माता से सौहार्दिक संबंधो का उपभोग नहीं करेगा |

चतुर्थ स्थान में चन्द्र युत लग्नेश कारको-भाव-नाशय सिद्धांत के अनुसार जातक कि माता के अधम दरिद्रता से उबरने या अपने जीवनकाल में  निश्चित तौर पर दरिद्रता का सामना करने की पूर्वसूचना देता है |

यद्यपि लग्नेश व चन्द्र जातक को जीवन में विलक्षण प्रेरणा व कलात्मक अभिलाषा प्रदान करता है तथापि जातक को परिवार में वह प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होगी जो जीवन के अन्य क्षेत्रों में उपलब्ध होगी |

यदि लग्नेश चतुर्थ स्थान में उच्चस्थ चन्द्र से सम्बद्ध हो तो परिस्थिति कदाचित विपरीत होगी क्योंकि यह जातक के माता से सौहार्दिक संबंधों का सूचक है तथा इसके अतिरिक्त जातक  को मातृपक्ष से संपत्ति भी प्राप्त होगी |

लानेश के चतुर्थ स्थान में, स्थित होने से, जातक को उत्तम भवन प्राप्त होगा तथा यदि इसके मंगल से सम्बद्ध होने पर  व्यक्ति को भूमिसुख प्राप्त होगा, परन्तु लग्नेश व मंगल चतुर्थ स्थान में समस्थित होने पर जातक को भुमिदोश भी प्रदान करेंगे | अतः जीवन में शाश्वतम दुष्प्रभावित होगा | व्यक्ति अपने जीवन में  अतुल धन कीर्ति प्राप्त करेगा, परन्तु उसके जीवनकाल में ही इसका नाश भी हो जायेगा | शाश्वतम, मंगल व लानेश की चतुर्थ स्थान के सापेक्ष स्थिति से निर्धारित किया जायेगा | जातक अपने लिए जो भी कीर्ति, यश व ऐश्वर्य उपार्जित या प्राप्त करता है, इसके उपभोग या उक्त प्राप्ति विशेष का स्थायित्व चतुर्थ स्थान के बलाबल पर निर्भर करता है | यदि यह सभी यहाँ युत हों तो शाश्वतम (स्थायित्व) का अभाव होगा | यह फलादेश पूर्णतः मंगल पर निर्भर करता है, क्योंकि यह चतुर्थ स्थान के कारकों में से एक तथा भूमि-सुख व शाश्वतम का भी कारक है |

अतः मंगल की लग्नेश के साथ चतुर्थ स्थान  में स्थितिमात्र ही जातक के जीवन के सर्वस्व अर्जन हेतु क्षयकारक होगी | सारी कमाई नष्ट हो जाएगी | इसे शाश्वतम करने हेतु चतुर्थ स्थान मे इस योग वाले जातक को अपने जीवनसाथी या संतान के नाम से व्यवसाय करना चाहिए  या अचल परिसंपत्तियां बनवानी चाहिए |

यदि चतुर्थ स्थानगत लग्नेश चन्द्र हो तो जातक को भुमिदोष प्राप्त होगा | मंगल भूमि का कारक है, अतः कारको-भाव-नाशय सिद्धांत के अनुसार जातक को भुमिदोष प्राप्त होगा | इस उद्देश्य से, जातक को भगवान कार्तिकेय या भगवान् हनुमान की पूजा करके आवश्यक परिहार अथवा  शांतिकर्म करवाने चाहिए, अन्यथा वह कभी अचल संपत्ति का स्वामी होने में  समर्थ नहीं होगा तथा सतत प्रयत्नरत रहेगा |

उपरोक्त वर्णन के विपरीत मंगल की चतुर्थ स्थान पर द्रष्टि शुभ होती है तथा शास्वतम प्रदान करती है |

यदि लग्नेश चतुर्थ स्थान में सूर्य से युत हो, तो जातक को पित्र दोष प्राप्त होगा तथा व्यक्ति पितरों से प्राप्त श्राप से पीडित रहेगा | स्वयं को इन श्रापों से मुक्त करने के लिए काशी अथवा गया जाकर अपने पूर्वजों हेतु गृह शांति अनुष्ठान करवा कर पित्रदोष-निवारण करवाना चाहिए | केवल तभी व्यक्ति सरकारी क्षेत्रों में जहाँ कार्यरत है, उत्तम प्रतिष्ठा पाने में सक्षम होगा अन्यथा वह सौहाद्रपूर्ण संबंध नहीं बना पायेगा | इसके कारण व्यक्ति : __

·         सदैव शासन अथवा उच्चाधिकारियों की भ्रांतबोध से पीडित रहेगा |

·         वरिष्ठ सहकर्मियों से उसके उत्तम संबंध नहीं होंगे |

·         सरकार अथवा शासन से उस पर किसी प्रकार का मिथ्यारोप लग सकता है |

·         यदि चतुर्थ स्थान गत लग्नेश शत्रु राशि में सूर्य युत हो तो जातक के पिता का आयुष्य संदेहास्पद होगा |

चतुर्थ स्थान में, बुध युत  लग्नेश शुभ होता है, क्योंकि जातक अत्यंत ज्ञानवान होगा | व्यक्ति अनुसन्धान अथवा अन्वेषण सम्बन्धी कार्य करेगा | ऐसा न होने पर जातक रसायनज्ञ बनेगा अथवा जीवन में रसायन सम्बन्धी कार्यों में संलग्न रहेगा | जीवन में मुख्य रुझान सदैव शिक्षा तथा सांसारिक विषयों को समझने व सुलझाने की ओर रहेगा |

बुध पर यहाँ कारको-भाव-नाशाय सिद्धांत नहीं  लगेगा, क्योंकि चतुर्थ स्थान शिक्षा स्थान है एवं बुध शिक्षा का कारक है | चतुर्थ स्थान में  लग्नेश के बुध से युत होने से कारको-भाव-नाशाय सिद्धांत नहीं लगेगा, क्योंकि अध्ययन द्वतीय स्थान तथा साथ ही पंचम स्थान से भी देखा जाता है | यह विशिशतः केवल चतुर्थ स्थान से ही सम्बद्ध नहीं है |

·         द्वतीय स्थान अध्ययन (चिंतन) स्थान है, चतुर्थ स्थान शिक्षा स्थान तथा पंचम स्थान विद्या या ज्ञान स्थान है |

अध्ययन से अभिप्राय पारम्परिक पढाई है जो वर्तमान में व्यक्ति को करनी चाहिए | पूर्वकाल में यह वेद व वेदांग थे | वर्तमान परिद्रश्य में यह विभिन्न संकायों में स्नातक एवं स्नान्कोत्तर उपाधि की प्राप्ति है | यह अध्ययन माना जाता है |

द्वतीय स्थान का अध्ययन जातक द्वारा किये जा  रहे पारंपरिक अध्ययन के  प्राकृतिक क्रम के अधीन आता है |

चतुर्थ स्थान शिक्षा स्थान है | अध्ययन से व्यक्ति का शिक्षित होना अनिवार्य नहीं है | शिक्षा अनुभवों व व्यक्तिगत प्रयासों से  प्राप्त होती है | व्यक्ति ने यद्यपि डॉक्टर की पढाई कीहो तथापि उसका यथार्थत शिक्षित होना अनिवार्य नहीं है | शिक्षा का संबंध व्यक्ति के मानसिक संतुलन व मनः स्थिति से है | इसका व्यक्ति के अध्ययन से कोई संबंध नहीं है | कई उत्तम शैक्षणिक योग्यता प्राप्त तथा उच्च पदासीन व्यक्ति मूढ़वत व्यवहार करते हैं | इसका कारण यही है कि उन्होंने अध्ययन तो किया है, परन्तु वे शिक्षित नहीं है |

पंचम स्थान विद्या या ज्ञान का स्थान है | वेद एवं वेदांग विद्याएँ हैं | ज्ञान की शिक्षा नहीं ली जा सकती | शास्त्रों, वेदों, वेदांगों, ज्योतिष की विद्या प्राप्त की जाती है, इनका अध्ययन नहीं किया जा सकता |  शास्त्रों व मंत्रो का ज्ञान लिया जाता है | ये विद्याएँ हैं| इन्हें शिक्षा के साथ सम्बद्ध नहीं किया जा सकता है | कठोपनिषद के अनुसार, जीवन में कर्मों दे मर्म का बोध कर श्रेय(जीवनोद्धारक, जो रोच्य होने आवश्यक नहीं) व प्रेय (जिनके करने में  आनंदानुभूति हो) कर्मों का अंतर समझ श्रेयकर्मों की धार्यता व प्रेयकर्मों का त्याग ही विद्या या ज्ञान है | अतः यथार्थ ही कहा गया है कि व्यवहार का परिष्करण ही ज्ञान है |

इन  तीनों भावों में यह मौलिक अंतर है | किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक, ईश्वरीय, धार्मिक या ज्योतिषीय प्रवृत्ति का वर्णन करते समय पंचम स्थान प्रमुख भूमिका निभाता है |  इसमें द्वतीय अथवा चतुर्थ स्थान का कोई योगदान अथवा संबंध नहीं है | किसी व्यक्ति के सामान्य ज्ञान के विश्लेषण में यह जानने के लिए कि क्या व्यक्ति के जीवन में शिक्षा की कोई प्रासंगिकता होगी, चतुर्थ का निरिक्षण किया जायेगा | व्यक्ति की मौलिक शिक्षा- वह शिक्षा ग्रहण करेगा या नहीं, उसका जीवन वृत्त कैसा होगा-इसका बोध द्वतीय स्थान से होगा | यही तीनो स्थानों में मुख्य अंतर है |

अन्यतः वक्री बुध जातक को भौतिक पदार्थों के संग्रह की ओर अधिक रुझान प्रदान करता है | व्यक्ति का मनोयोग पूर्णतया इसी ध्येय पर केन्द्रित होगा तथा यौनसुख में उसकी कम आसक्ति होगी |

यदि यह बुध शनि से सप्तम स्थान  से द्रष्ट होम तो व्यक्ति नपुंसक अथवा यौनाचार्य में  अनासक्त हो सकता है |

यदि यह बुध शुक्र से युत हो, तो व्यक्ति अपने से निम्न वर्ग की स्त्रियों से  कामलिप्त रहेगा |

चतुर्थ स्थान में ब्रहस्पति युत लग्नेश जातक को इस सीमा तक कामी बनाएगा कि व्यक्ति निर्जन स्थान में भी सरलता से स्त्री प्राप्त करने में सफल होगा |  व्यक्ति की शारीरिक संरचना आकर्षक होगी |

चतुर्थ स्थान  गत ब्रहस्पति युत लग्नेश जातक को शास्त्रादी में  रुझान देता है तथा ईश्वरीय ज्ञानार्जन में जीवन व्यतीत करेगा |

चतुर्थ स्थान में  लग्नेश युत होने से जातक को जीवनविलास का आनंद प्रदान करता है | व्यक्ति अत्यधिक आडम्बरी होगा तथा उत्तम भवन प्राप्त करेगा | व्यक्ति श्रंगार प्रिय होगा |

शुक्र युत लग्नेश के जातक को लोक संपर्क या संपर्क सम्बन्धी सेवाकर्म अपनाना चाहिए क्योंकि व्यक्ति का यौनाकर्षण अन्यों को आकर्षित करेगा जिससे व्यक्ति अन्यों से सरलता पूर्वक पूर्ण करवाने में समर्थ होगा | व्यक्ति में शारीरिक सुन्दरता भले न हो, परन्तु व्यक्ति का प्रस्तुतीकरण इतना सुंदर होगा कि लोग आकर्षित होने, अतः व्यक्ति अत्यंत प्रेरक रूप में निपुणता प्राप्त करने में समर्थ होगा |

यदि लग्नेश चतुर्थ स्थान में शनि युत हो, तो जातक भाग्यवान तथा ऐसे परिवार में जन्मा है जहाँ वह सभी भौतिक सुख-सुविधाएँ भोगेगा | व्यक्ति को अनेकों नौकरों पर प्रभुत्व प्राप्त होगा तथा अनेकों वाहन प्राप्त होंगे | यह व्यक्ति को कुटिल स्वाभाव भी प्रदान करेगा |

शनि की द्रष्टि उसकी स्थिति से किंचित दुर्बल होती है, अतः प्रभाव भी उसी अनुपात में कम होगा |

व्यक्ति विशाल जनसमूह को आकर्षित करेगा तथा राजनेता अथवा राजनैतिक व्यक्ति बनेगा | यदि श्नियुत लग्नेश बली सूर्य व मंगल से द्रष्ट या युत हो तो व्यक्ति अवश्यमेव राजनैतिक होगा |

चतुर्थ स्थान गत लग्नेश व्यक्ति को अनिवार्यतः मिथ्यावादी बनता है | जातक सत्यनिष्ठा धारण नहीं करेगा तथा उसे सार्वजानिक विश्वास प्राप्त नहीं होगा | व्यक्ति स्वयमेव सत्याचारी नहीं होगा | जातक  के प्रसवपूर्व कष्टों के आधिक्य के कारण असामयिक प्रसव होने की संभावना है | इससे यह भी स्पष्ट होता है कि माता गर्भावस्था से सम्बंधित कष्टों से पीडित रही होगी |

यदि लग्नेश सहित, राहू चतुर्थ स्थान में, मंगल से नवम स्थान से द्रष्ट होम जातक शाल्याचिक्त्सा द्वारा जनित रंध्र शिशु होगा | यदि यह योग पापी शनि से सम्बद्ध हो तो  विक्रतांग शिशु होगा | यदि चन्द्र के साथ साथ चतुर्थेश बलहीन हो तो जिस व्यक्ति को जातक का पिता माना जाता है वह उसका जन्मदाता नहीं है | अन्य शब्दों में, जो व्यक्ति पिता कहला रहा है, वह जातक का वास्तविक पिता नहीं है |

चतुर्थ स्थान में चन्द्र व  राहू अपारम्परिक शिक्षा, जैसे वैवसाईट अभिकल्पन इत्यादि प्रदान करेंगे |

चतुर्थ स्थान में  केतु युत लग्नेश, जातक को रुग्ण बनाएगा | ऐसे व्यक्ति मानसिक तौर पर जीवन में असफल सिद्ध होते हैं तथा जीवन में सम्भावित सुखों का  आनंद नहीं ले पाते |

 



सप्तम स्थान गत लग्नेश

सप्तम स्थान गत लग्नेश

 

       सप्तम स्थान को विशुद्ध केंद्र नहीं माना जाता | शास्त्रों  के अनुसार जब भी सप्तमेश कि दशा आती है, तो जातक को शांतिकर्म करवाने चाहिए अन्यथा उसे जीवन में सुख प्राप्त नहीं हो सकता | सप्तम स्थान को मारक स्थान माना जाता है | लग्न के उद्यम होने से सप्तम स्थान अस्तम होगा |

आत्मनुराग

       लग्नेश सप्तम स्थान में तथा सप्मेश लग्न में  होने पर जातक आत्मानुरागी अर्थात केवल अपने से प्यार करने वाला होगा | व्यक्ति में असामन्य व अत्यधिक निज प्रेम होता है, अतः उसके अविवाहित रहने कि सम्भावना है | विवाह कि स्थिति में भी जातक एकाकी सा एकांत को अधिमान देता है | अतः व्यक्ति विवाहित जीवन का आनंद नहीं ले पायेगा तथा दाम्पत्य जीवन का निर्वाह नहीं करेगा | ऐसे जातक के विचार से उनके समान या उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं हो सकता |

·         नाढ़ीशास्त्र के सिद्धांतानुसार सप्तम स्थान गत लग्नेश अथवा लगन्गत सप्तमेश दर्शाते हैं कि जातक कुंवारा होगा | इसका कारण है कि लग्नेश, जो आत्मकारक है, सप्तम स्थान या कलत्र स्थान गत होता है | अतः जातक आत्मानुरागी है | उसके विचार में, कोई भी जातक उसका साथी बनने योग्य नहीं है | इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि व्यक्ति अपने पारिवारिक दायरे में ही विवाह करेगा | जातक दीर्घायु एवं सहोदरों के प्रति समर्पित होगा |

सामाजिक छवि

       सप्तम स्थान सामाजिक छवि का सूचक है, अतः सप्तम स्थान गत लग्नेश जातक को श्रेष्ठ सामाजिक छवि प्रदान करता है | व्यक्ति कि सामाजिक छवि विलक्षण होगी, परन्तु उसका आत्मानुराग जातक को निजत्व एवं निज उपलब्धियों में इतना अनुरक्त बनाएगा कि अन्य जीवन मूल्यों कि उपेक्षा कर देगा |

सहयोग

       यह सहयोग स्थान भी है इसलिए व्यक्ति में अन्यों कि भावनाओं या विचारो को धारण करने कि क्षमता नहीं होगी | वह कदाचित अपने विषय में वार्ता करेगा अथवा संवादहीन रहेगा |

विदेशवास

       सप्तम स्थान विदेशी भूमि में वास का स्थान है | इससे यह संकेत भी मिलता है कि व्यक्ति विदेश में समृद्ध होगा तथा वहीँ वास करने का प्रयत्न करेगा | जातक विदेश में यश तथा अक्षय धन प्राप्त करेगा | अतः सप्तम स्थान में नवमेश व तृतीयेश युत लग्नेश दर्शाता है कि जातक विदेशवास करेगा | यदि इस योग का द्वादशेश से भी संबंध हो तो व्यक्ति अवश्यमेव परदेश या विदेशभूमि में वास करेगा तथा वहीँ सुयश व धन प्राप्त करेगा | व्यक्ति अत्यंत स्वेच्छाचारी होगा तथा निजोद्योग से जीवन में उन्नति करेगा |

       सप्तम स्थान में  लग्नेश व सूर्य से दशमेश या दशम स्थान के संबंध सहित युत हो तो व्यक्ति चिकित्सक बनेगा |

       यदि सप्तम स्थान में लग्नेश का राहू-केतु रेखांश से सम्बद्ध हो, तो शल्य चिकित्सक दर्शाता है | इस योग में विवाह की संभावना नहीं है | इस योग में वैवाहिक जीवन सदैव तनावमय रहेगा, ऐसे जातक सनातन कुंवारे होंगे यदि यह विवाह करेंगे भी तो उनका दाम्पत्य जीवन सौहाद्रपूर्ण नहीं होगा अथवा दांपत्य सुख प्राप्त नहीं होगा |

       विशेषतः सप्तम स्थान गत लग्नेश का सूर्य से संबंध व्यक्ति को यौनाचार रहित बनता है, व्यक्ति या तो यौनाचार में किंचित आनंद नहीं पायेगा अथवा आंशिक नपुंसक हो सकता है |

       सप्तम स्थान गत लग्नेश का चन्द्र से संबंध जातक को गूढ़तत्व प्रदान करता है |  यह व्यक्ति को प्रिय बनाएगा | यद्यपि जातक में किंचित नारीवत स्वाभाव होगा, तथापि जीवन के प्रति जातक के विचार विस्तृत होंगे तथा व्यक्ति रूढ़िवादी विचारों का अनुसरण नहीं करेगा अथवा दूसरों के प्रति रूढ़िवादी विचार पोषित नहीं करेगा |

       यदि लग्नेश युत चन्द्र, सप्तम स्थान गत, नीच राशिगत हो तो जातक को मानसिक विचलन प्राप्त हो सकता है | यद्यपि जातक उत्तम सामाजिक छवि पर्येगा, तथापि जहाँ तक शारीरिक रूप का संबंध है, व्यक्ति सदैव वैचारिक शुन्यता ग्रस्त होगा तथा सदैव परिस्थितियों से सामंजस्य स्थापित करने में  असफल रहेगा |

       यदि यह राहू-केतु रेखांश से सम्बद्ध हो तो व्यक्ति आत्महत्या कर सकता है अथवा मात्र द्वतीय या बुध से संयोग हो तो व्यक्ति में आत्मघाती प्रवृत्ति होगी |

       चन्द्र सप्तम स्थान में किसी भी परिस्थिति में नीचगत नहीं होना चाहिए | सप्तम स्थान में लग्नेश चन्द्र व मंगल से युत होने पर व्यक्ति अत्यंत शक्तिशाली, पुष्ट देहि व प्रलापी होगा तथा अपने आलोचनात्मक विश्लेषक स्वाभाव के कारण अल्पमित्रवान होगा | व्यक्ति अपनी जन्मभूमि से बाहर अत्याधिक व्यावसायिक उन्नति प्राप्त करेगा तथा वहां यश व धन अर्जित करेगा | व्यक्ति के परदेश गमन के समय नवमेश व तृतीयेश का सप्तमेश से अवश्यमेव संबंध बनेगा |

       सप्तम स्थान गत लग्नेश कि बुध से युति दर्शाती है कि व्यक्ति कलाकार बनेगा तथा यदि बुध सुस्थित न हो तो प्रतिशोधी भी हो सकता है | व्यक्ति किसी से कभी अपमानित होने पर उग्र प्रतिशोध भावनाग्रस्त हो सकता है | व्यक्ति सदैव जीवन में घटित समस्त सुखद घटनाओं के स्थान पर अप्रिय घटनाओं को स्मरण रखेगा, जिसके परिणामवश, जीवन में  सदैव हतोत्साहित व खिन्नचित रहेगा |

       सप्तम स्थान में लग्नेश ब्रहस्पति युत होने से जातक को अत्यंत शुद्धचित्, पुण्यात्मा, सुदर्शन व धर्म कर्म में अनुरक्त बनता है | ऐसा व्यक्ति जो मुख्यतः ईश् निष्ठ होगा |

 

       सप्तम स्थान गत लग्नेश शनि से युति जातक के भाग्यवान नेता, तथा अपने कार्यमंडल में अध्यक्ष या प्रबंध निदेशक होने कि सूचक है | शुद्ध कार्य क्षमता के कारण व्यक्ति उच्चतम पद प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा यद्यपि अविवाहित होगा, परन्तु यदि शनि स्वराशिगत हो तो व्यक्ति जीवन के उत्तरार्ध में अपनी पसंद कि कन्या से विवाह करेगा, परन्तु केवल संसर्ग हेतु न कि संतान हेतु |

दशम स्थानगत लग्नेश

ज्योतिषीय ज्ञान

दशम स्थान गत लग्नेश

       कुंडली का सर्वाधिक पवित्र व महत्वपूर्ण स्थान है दशम स्थान | यदि किसी स्थान से दशम स्थान बली हो तो वह स्थान विशेष शाश्वत स्वाभाव का माना जाता है | उदाहरणार्थ दूसरे स्थान का विश्लेषण किया जाये तो दूसरे स्थान से दशम स्थान, अर्थात एकादश स्थान पर ध्यान देना चाहिए | यदि एकादश स्थान में शुभ गृह हों तथा एकादश स्थान बली हो तो दूसरे स्थान को स्वतः बल प्राप्त हो जाता है | इसी प्रक्रार यदि षष्ठ स्थान को जानना चाहें तो षष्ट स्थान से दशम स्थान अर्थात तृतीय स्थान को देखें, यदि तृतीय स्थान बली है तो यह कहा जा सकता है कि षष्ट स्थान स्वतः बली हो गया है तथा जातक रोगमुक्त जीवन प्राप्त करेगा |

       इसलिए लग्न का बलाबल दशम स्थान से देखना होगा | दशम भाव गत लग्नेश अद्वितीय बल प्राप्त करता है यह ऐसे व्यक्ति का सूचक है जो स्वाभाविक भाग्यवान है तथा जो शुभ गुणों से युक्त होगा व जीवन में उन्नति करेगा ऐसा व्यक्ति जो कुशल प्रशासक बनेगा | ऐसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से अपने पूर्वकर्मों के शुभ फलों का उपभोग करने ही इस जीवन में जन्म लेते हैं |

·         दशम स्थान गत लग्नेश भाव-संधि में नहीं होना चाहिए, ऐसा होने पर लग्न का बलक्षय होता है | इस संबंध में किसी भी केंद्र में लग्नेश भाव-संधि में स्थित नहीं होना चाहिए |  भाव-संधि दो प्रकार की होति है |

·         आरोह भाव-संधि

·         अवरोह भाव-संधि

जब गृह नवम स्थान से दशम स्थान में प्रवेश कर रहा हो, तो नवम भाव के उपरांत प्रथम भाव-संधि को आरोह भाव-संधि कहते हैं |

जब कोई गृह भाव-मध्य से अंतिम दस अंशो में जा रहा हो तो इसे अवरोह भाव-संधि कहते हैं |

शुब गृह आरोह भाव-संधि में तथा क्रूर गृह अवरोह भाव-संधि में स्थित होने चाहिए |

जब कोई गृह भावारम्भ बिंदु पर स्थित हो तो वह सर्वाधिक बली गृह बन जाता है | भावारम्भ स्वामी सर्वाधिक बली स्वामी है, वे स्थानविशेष के लिए सर्वप्रथम विश्वस्त उत्तरदायी गृह है | वे उस स्थान के अधिपति से भी अधिक मग्त्वापूर्ण होते हैं |

उदहारण

       यदि सप्तम स्थान मकर राशी का हो तथा भावारम्भ बिंदु पांच अंश व बयालीस मिनट पर हो, जो उत्तरा शाढा नक्षत्र (जिसका स्वामी सूर्य है)  में आता है, तो सप्तम स्थान का प्रथम दायित्व सूर्य पर होगा न कि शनि पर, हालाँकि वह राशीश है |

·         अतः सूर्य पर दुष्प्रभाव देखने होंगे तथा वैवाहिक विलम्ब अथवा विच्छेद के लिए सूर्य ही उत्तरदायी होगा |

यदि स्थानाधिपति तथा भावारम्भ नक्षत्रेश सम- संबंध अथवा संयोग बनायें तो यह अत्यंत शुभ माना जाता है |  यदि महादाशाधिपति अंतर्दाशाधिपति स्थानविशेष के भावारम्भ नक्षत्रेश से युत हो, तो उस स्थान के कार्कतवों का फलित होना सुनिश्चित है |

शुभ गृह होने से दशम स्थान गत लग्नेश आरोह के समय में अतिशुभ माना जाता है | क्रूर गृह होने पर यह अवरोहम में शुभ माना जायेगा तथा भाव-संधि बिंदु में प्रत्येक गृह चाहे वह शुभ हो या क्रूर, शुभ होगा | हालाँकि दशम स्थान में लग्नेश अत्यंत बली माना जाता है, परन्तु वह दिग्बलाहीन नहीं होना चाहिए |

लग्नेश होकर शुक्र दशम स्थान गत होने पर जातक को दीर्घ, परन्तु निस्सार जीवन प्रदान करेगा | ऐसा दीर्घ जीवन किस प्रयोजन का होगा यदि इसके सहायक अवयव ही विद्यमान न हों |

मंगल या सूर्य की लग्नेश होकर दशम स्थान में स्थिति व्यक्ति को शुभ गुण युक्त अलौकिक भाग्यशाली तथा जीवन में सद्गुणों का भोगने वाला बनाती है | दशम स्थान कर्म स्थान होने से इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि जातक इस संसार में  उच्चकोटि या महत्व के कर्म करने हेतु जन्मा है, अर्थात कर्मयोगी होगा |

जातक को अत्यंत शुभ पूर्व पुण्य प्राप्त होगा | इस उद्देश्य हेतु पंचम नवम तथा क्रमशः उनके स्वामी व प्रतिस्थायियों में अन्य सहायक तत्व होने चाहिए | व्यक्ति सदैव सफल होगा तथा दूसरों के  प्रति उसका व्यवहार अत्यंत सहायतापूर्ण होगा | व्यक्ति अल्पावस्था में ही जीविकोपार्जन प्रारंभ कर देगा |

जातक कि आर्थिक स्थिति सुद्रढ़ नहीं होगी, परन्तु उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होगा | इस हेतु लग्नेश का आरोग्यकारक चन्द्र से संबंध देखना होगा इससे व्यक्ति के जीवन में संभावित कष्टों कि मात्रा का भी अध्ययन किया जा सकता है |  व्यक्ति स्वनिर्मित व्यक्तित्वा तथा जीवन में स्वनिर्मित व्यक्ति तथा स्वावलंबी होगा |

दशम स्थान गत लग्नेश केन्द्रधिपति दोष से मुक्त होना चाहिए सामान्यतः लग्नेश पर कदापि केन्द्रधिपति दोष नहीं लगता क्योंकि वह एक केंद्र के साथ साथ एक कोण का भी स्वामी होता है | तो ये दोष कब लागू होगा ?

यह केवल तभी संभव है जब लगेंश किसी अन्य केंद्र का भी स्वामी हो, जो केवल ब्रहस्पति तथा बुध अर्थात मिथुनम, कन्या, धनु व मीन लग्न के लग्नेश होने पर लागू हो सकता है |

दशम स्थान गत लग्नेश दर्शाता है कि जातक के जनम के पश्चात् उसके पिता को अत्यधिक लाभ प्राप्त होगा | यह जातक के परिवार में एकमात्र पुत्र होने का भी सूचक है | इसके लिए लग्नेश की सूर्य से युति या द्रष्टि होनी चाहिए या नक्षत्रों का संबंध होने चाहिए |

 

यदि सूर्य लग्नेश होकर दशम स्थान में स्थित हो, तो जातक अपने पिता कि एकमात्र पुत्र संतति होगी |  यह जातक के अपने पारिवारिक पारम्परिक व्यवसाय में संलग्न होने का भी सूचक है | 

Latest Tweets

Follow us on Facebook

www.repldradvice.com